उत्तर प्रदेश के बदायूं से आई यह खबर सिर्फ़ एक घटना नहीं है, बल्कि सिस्टम पर लगा एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब अब टालना मुश्किल होता जा रहा है। घटना क्या है?
बदायूं में 7 वर्षीय आयुष अपने पिता की टायर पंक्चर की छोटी-सी दुकान पर बैठा था। वहीं एक कांस्टेबल विकास यादव अपनी बाइक लेकर पहुँचा और बच्चे से बाइक में हवा भरने को कहा। लेकिन आयुष कोई मैकेनिक नहीं था, न ही उसकी उम्र काम कराने लायक थी। जब बच्चे ने मना किया तो जवाब में उसे मिला वर्दी का थप्पड़। इतना ज़ोरदार थप्पड़ कि 7 साल का बच्चा वहीं बेहोश होकर गिर पड़ा।
सवाल सिर्फ़ थप्पड़ का नहीं है
यह मामला सिर्फ़ “एक थप्पड़” का नहीं है। यह मामला है
सत्ता के नशे का वर्दी की आड़ में गुंडागर्दी का और सबसे बढ़कर, एक मासूम की सुरक्षा की पूरी तरह नाकामी का
जिस बच्चे की उम्र अभी स्कूल की किताबें उठाने की है,
उस पर वर्दी में खड़ा आदमी हाथ उठाए तो सोचिए, आम आदमी खुद को कितना असहाय महसूस करेगा? जिस बच्चे की उम्र अभी स्कूल की किताबें उठाने की है, उस पर वर्दी में खड़ा आदमी हाथ उठाए तो सोचिए, आम आदमी खुद को कितना असहाय महसूस करेगा?
क्या यह कानूनन अपराध नहीं है?
बिल्कुल है। नाबालिग पर हिंसा → गंभीर अपराध
ड्यूटी के दौरान मारपीट → सत्ता का दुरुपयोग, बच्चे को बेहोश कर देना → साधारण नहीं, गंभीर हमला कानून साफ़ कहता है कि नाबालिग पर शारीरिक हिंसा किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं की जा सकती चाहे करने वाला आम नागरिक हो या पुलिस की वर्दी में।
वर्दी का मतलब क्या यही रह गया है?
पुलिस की वर्दी इसलिए नहीं होती कि बच्चों से मुफ्त काम कराया जाए मना करने पर थप्पड़ जड़ा जाए और फिर सिस्टम के भरोसे मामला दबा दिया जाए अगर यही थप्पड़ किसी अफ़सर के बच्चे को पड़ा होता, तो क्या अब तक FIR, गिरफ्तारी और सस्पेंशन नहीं हो चुका होता?
आयुष आज बेहोश हुआ, कल कोई और
आज आयुष है, कल किसी मज़दूर का बेटा, परसों किसी ठेले वाले की बेटी। अगर ऐसे मामलों पर चुप्पी रही, तो ये थप्पड़ सिर्फ़ एक बच्चे के गाल पर नहीं, पूरे समाज के चेहरे पर पड़ते रहेंगे। अब क्या होना चाहिए? आरोपी कांस्टेबल पर तुरंत FIR सस्पेंशन और विभागीय जांच बच्चे की मेडिकल रिपोर्ट सार्वजनिक और यह संदेश कि वर्दी अपराध की ढाल नहीं है कानून का राज तभी माना जाएगा, जब कानून के रखवाले खुद कानून मानेंगे। वरना लोग यही पूछते रहेंगे
वर्दी में इन गुंडों का क्या इलाज है?
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