100 सिट-अप की सज़ा 13 साल की बच्ची की मौत क्या स्कूलों में यह बर्बरता जायज़ है?
क्या आपको याद है वो टाइम जब हम बच्चे थे और स्कूल थोड़ी सी देर से पहुँच जाते थे? टीचर गुस्सा करते थे, डांट पड़ती थी लेकिन जिंदगी नहीं छिनती थी। आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहा हूँ, जिसमें 10 मिनट की देरी ने एक पूरे परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बर्बाद कर दी। एक ऐसी कहानी जहाँ किताबों और कॉपी से भरे बैग के साथ एक लड़की स्कूल तो गई लेकिन घर वापस उसकी लाश आई।
भाग 1: वो सुबह जो कभी शाम नहीं बन पाई
सुबह का वक्त था। 13 साल की वो बच्ची जिंदगी से भरी, हँसती, खिलखिलाती अपना स्कूल बैग लेकर बाहर निकली।
घर वाले समझ रहे थे कि वो, हमेशा की तरह, आज भी स्कूल जाकर शाम को लौट आएगी। लेकिन उस मासूम को क्या पता था कि ये उसका आखिरी स्कूल जाना होगा। वो रोज़ 8 बजे तक पहुँच जाती थी, लेकिन उस दिन सिर्फ 10 मिनट लेट हो गई। 10 मिनट। हमारे लिए कुछ भी नहीं। लेकिन उस बच्ची के लिए यही 10 मिनट उसे मौत के दरवाज़े तक ले आए।

भाग 2: स्कूल गेट पर खड़ा ‘अनुशासन का राक्षस
स्कूल में जैसे ही वो दाखिल हुई ड्यूटी पर खड़े टीचर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। लेट क्यों आई? आवाज़ इतनी तेज कि पूरा कॉरिडोर सुन ले। बच्ची घबराकर बोली, सार, घर पर थोड़ी दिक्कत थी माफ कर दीजिए पर टीचर ने मानो सुनना ही नहीं चाहा। उनका अहंकार, उनकी ‘डिसिप्लिन की परिभाषा’, उस बच्ची के भविष्य से कहीं ज़्यादा बड़ी थी।
उन्होंने तुरंत आदेश दिया: 100 सिट-अप्स करो अभी के अभी दूसरे बच्चे डर से चुप थे, कुछ के चेहरे पर सहानुभूति थी, लेकिन वो सिर्फ देख सकते थे रोक नहीं सकते थे।
यह भी पढ़ें, अब तक का सबसे डरावना मर्डर: पत्नी ने पति के टुकड़े कर ड्रम में भरे और फरार हो गई
भाग 3: सिट-अप नंबर 1 से लेकर 100 तक
पहले 10–15 सिट-अप्स तो किसी तरह कर लिए। लेकिन धीरे-धीरे उसका शरीर जवाब देने लगा। 20… 30… 40…
उसके हाथ कांपने लगे। पैर थरथराने लगे। सांस फूलने लगी।
लेकिन टीचर का दिल नहीं पसीजा। “तेज़ करो” “और नीचे बैठो!” “नाटक मत करो!” ये हर शब्द उस बच्ची के दिल पर,
उसकी हड्डियों पर, और उसकी जान पर पड़ता जा रहा था।
जब वह 70 के करीब पहुंची, वह बार-बार गिरने लगी। बच्चों ने कहा, “सार, उसकी हालत खराब हो रही है” लेकिन जवाब आया: “लेट आई है सज़ा तो मिलेगी” वो जोर लगाकर 100 तक पहुंची, लेकिन उसके बाद वो सीधी खड़ी भी नहीं हो पा रही थी।
भाग 4: “सार, मुझे चक्कर आ रहा है
वो बच्ची लड़खड़ाते हुए बोली “सार मुझे सांस नहीं आ रही”
लेकिन टीचर ने कहा “क्लास में जाओ, पानी पीकर ठीक हो जाओगी।” क्लास तक पहुँचते-पहुँचते वो गिर पड़ी। बच्चों ने उसे उठाया, हाथ-पैर ठंडे, सांस तेज़, धड़कन अनियमित
लेकिन स्कूल मैनेजमेंट ने पहले घरवालों को सूचना देने के बजाय “इमेज बचाने” पर ध्यान दिया।

भाग 5: अस्पताल… और एक टूटता हुआ परिवार
जब तक उसे अस्पताल ले जाया गया, उसकी हालत गंभीर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने कहा “उसके शरीर ने ओवर-एक्सर्शन बर्दाश्त नहीं किया उसके अंग फेल हो चुके हैं” परिवार की आंखों में आँसू घुटनों पर बैठकर भगवान से प्रार्थना डॉक्टरों का भागदौड़ लेकिन सब बेकार। कई घंटों की कोशिशों के बाद डॉक्टर बाहर आए और कहा: “हम उसे नहीं बचा सके।” जिस बच्ची ने सुबह नाश्ता करके स्कूल का बैग उठाया था, उसकी लाश घर वापस आई।
भाग 6: स्कूल की सच्चाई बिना मान्यता, बिना नियम
जब जांच हुई तो सामने आया जिस स्कूल में यह घटना हुई,
वह स्कूल बिना मान्यता चल रहा था। ना RTE का पालन,
ना बच्चों की सुरक्षा का रिकॉर्ड, ना प्रशिक्षित शिक्षक, ना किसी तरह का सरकारी निरीक्षण। ऐसे स्कूलों में बच्चों के साथ जो होता है उसका कोई हिसाब नहीं।
भाग 7: क्या ऐसी सज़ाएँ कानूनी हैं?
भारत में शारीरिक सज़ा पूरी तरह ग़ैर-क़ानूनी है।
किसी भी हालत में नहीं दी जा सकती।
👉 RTE Act की धारा 17
शारीरिक सज़ा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाती है।
👉 NCPCR Guidelines
किसी भी तरह की सज़ा देना अपराध है।
👉 Supreme Court
शिक्षक बच्चे को चोट पहुँचाने पर जेल जा सकता है।
और यहाँ तो सज़ा की वजह से मौत हुई है।
ये सीधा कथित हत्या (Culpable Homicide) का मामला बनता है।
भाग 8: असली सवाल कौन सा है?
सवाल यह नहीं कि वो बच्ची 10 मिनट लेट क्यों हुई थी।
सवाल यह है कि शिक्षक को किसने हक़ दिया कि वह उसके शरीर पर, उसकी जान पर, उसके भविष्य पर इतना बड़ा अत्याचार करे? सवाल यह है कि जब देश में लाखों स्कूल हैं कितने स्कूल ऐसे हैं जहाँ आज भी बच्चों को मारा जाता है, घुटनों के बल खड़ा किया जाता है, धूप में खड़ा किया जाता है, और ऐसी अमानवीय सज़ाएँ दी जाती हैं। ये सिर्फ एक बच्ची की मौत नहीं ये सिस्टम की मौत है। ये इंसानियत की मौत है।
अंत एक प्रश्न जो हर माता-पिता के दिल को चीर देगा
सोचिए अगर आपका बच्चा एक दिन स्कूल 10 मिनट लेट हो जाए, तो क्या उसकी सज़ा मौत होगी? क्या अनुशासन का मतलब जान लेकर अनुशासन सिखाना है? स्कूल, जहाँ बच्चों का भविष्य बनता है क्या वो जगह कब्रगाह बन चुकी है?
अगर इस बच्ची के लिए हम आज आवाज़ नहीं उठाएंगे,
तो कल आपके और हमारे बच्चों के साथ भी कोई यही कर सकता है। बच्चों पर अत्याचार बंद होना चाहिए। बिना मान्यता वाले स्कूलों पर कार्रवाई होनी चाहिए। और ऐसे शिक्षकों को सज़ा मिलनी ही चाहिए।
दिल्ली ब्लास्ट में रोहतक की डॉक्टर प्रियंका गिरफ्तार मीडिया की चुप्पी क्यों?
बुलंदशहर की दिल दहला देने वाली घटना: भागती हुई महिला अपराधी नहीं, गैंगरेप पीड़िता निकली
