Justice or Bias? सरफराज को फांसी और चेतन शर्मा पर सिस्टम की रहमदिली

इंसाफ़ की कुर्सी पर बैठा दोहरा मापदंड:
सरफराज को फांसी, चेतन शर्मा पर चुप्पी क्यों?

क्या कानून सबके लिए बराबर है? 🤔

बहराइच हिंसा के दोषी सरफराज को फांसी की सज़ा मिली।
कानून के नज़रिए से देखें तो यह फैसला सही है। जो दोषी है, उसे सज़ा मिलनी ही चाहिए। इस पर कोई बहस नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसी फैसले के साथ भारत का ज़मीर एक और सवाल पूछने को मजबूर हो गया है और यह सवाल कोई राजनीतिक नारा नहीं, न्याय व्यवस्था के सामने रखा गया आईना है। अगर सरफराज फांसी का हक़दार है, तो फिर चलती ट्रेन में चार लोगों की हत्या करने वाला चेतन शर्मा आज तक फांसी के फंदे से दूर क्यों है?

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दो अपराध, दो तस्वीरें

31 जुलाई 2023। एक चलती ट्रेन। RPF का जवान। वर्दी पहने। सरकारी बंदूक हाथ में। चार लोगों को एक-एक कर गोली मार दी जाती है। चार लाशें गिरती हैं। पूरा देश यह दृश्य देखता है। लेकिन कुछ ही घंटों में एक शब्द सामने आता है
मानसिक बीमारी।” इलाज की बातें होती हैं। काउंसलिंग की चर्चा होती है। कानूनी प्रक्रिया लंबी हो जाती है। अब ज़रा तुलना कीजिए।

सरफराज का मामला

सरफराज जिसका नाम लेते ही पहचान साफ़ हो जाती है।
वह मुस्लिम है। उसके लिए कोई “मानसिक स्थिति” की बहस नहीं। कोई लंबी सहानुभूति नहीं। कोई नरमी नहीं। फैसला सीधा है  दोषी है → फांसी।

Chetan Sharma hatyakand 2023

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तो सवाल उठता है…

क्या दोनों अपराधों का पैमाना एक जैसा था? क्या चार लोगों की हत्या और सामूहिक हिंसा में कोई नैतिक अंतर है? या फिर फर्क अपराध में नहीं, अपराधी की पहचान में है? एक मुस्लिम जिसके साथ सिस्टम कठोर है। दूसरा गैर-मुस्लिम
जिसके लिए सिस्टम “कारण” ढूंढता है।

क्या धर्म भी एक फैक्टर है?

यह कहना आसान है कि “धर्म का कोई रोल नहीं।” लेकिन सवाल पूछना ज़रूरी है। अगर सरफराज का नाम राम या मोहन होता, तो क्या बहस का स्वर यही रहता? अगर चेतन शर्मा का नाम सरफराज होता, तो क्या “मानसिक बीमारी” पहला शब्द बनता? क्या मीडिया की हेडलाइंस वही होतीं?
क्या सोशल मीडिया पर वही सहानुभूति दिखती? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि भारत में न्याय सिर्फ अदालतों में नहीं, धारणा और माहौल में भी तय होता है।

All Eyes on Indian Muslim

वर्दी, सिस्टम और सुरक्षा कवच

चेतन शर्मा के पास सिर्फ बंदूक नहीं थी, उसके पास वर्दी थी।
वर्दी जो अक्सर, जवाबदेही से ज़्यादा, संरक्षण बन जाती है।
सरफराज के पास क्या था? न वर्दी।, न सिस्टम।, न सहानुभूति।,

अगर कानून सच में अंधा है…

तो फिर ये फर्क क्यों? क्यों एक को फांसी मिलती है
और दूसरे के लिए फाइलें, मेडिकल रिपोर्ट और बहसें?
क्यों एक के नाम के साथ धर्म जुड़ जाता है और दूसरे के नाम के साथ “बीमारी”?

निष्कर्ष: सवाल कानून से नहीं, नीयत से है

यह लेख किसी अपराधी को बचाने के लिए नहीं है। यह लेख यह कहने के लिए नहीं है कि सरफराज को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए थी।

यह लेख सिर्फ यह पूछता है कि—

अगर सज़ा का पैमाना एक है,
तो उसका इस्तेमाल भी एक जैसा क्यों नहीं?

जब तक यह सवाल ज़िंदा है,
तब तक यह मानना मुश्किल है कि
भारत में इंसाफ़
सिर्फ कानून से चलता है।

कभी-कभी
नाम से,
धर्म से,
और वर्दी से भी।

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