JNU फिर चर्चा में: उमर खालिद–शरजील इमाम के समर्थन में जुलूस, विवादित नारों से गरमाया माहौल
नई दिल्ली
कई महीनों की खामोशी के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) एक बार फिर देश की सियासी बहस के केंद्र में आ गया है।इस बार वजह है उमर खालिद और शरजील इमाम के समर्थन में निकाला गया जुलूस, और उसमें लगाए गए ऐसे नारे, जिन्होंने पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया पैदा कर दी है।
जुलूस में क्या हुआ?
JNU परिसर में छात्रों के एक समूह ने जुलूस निकाला।
जुलूस के दौरान नारे लगाए गए
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मोदी–शाह की कब्र खुदेगी, JNU की धरती पर
इन नारों के सामने आते ही सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो गए और कुछ ही घंटों में मामला राष्ट्रीय बहस बन गया।
नारे या नफरत? सवाल खड़े
इन नारों को लेकर दो धाराएं साफ़ दिखाई दे रही हैं समर्थकों का कहना है कि यह सरकार के खिलाफ राजनीतिक विरोध का प्रतीक है, न कि किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा की अपील।आलोचकों का आरोप है कि इस तरह की भाषा लोकतांत्रिक विरोध नहीं बल्कि खुला उकसावा है, जो कानून–व्यवस्था के लिए खतरा बन सकती है। यही वजह है कि JNU एक बार फिर “अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम जिम्मेदारी” की बहस का मैदान बन गया है।
उमर खालिद और शरजील इमाम क्यों चर्चा में?
उमर खालिद 2020 दिल्ली दंगों से जुड़े UAPA केस में जेल में बंद हैं।शरजील इमाम CAA विरोध के दौरान दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों के आरोप में जेल में हैं। दोनों ही मामलों में कानूनी प्रक्रिया अभी चल रही है और अदालत ने अंतिम फैसला नहीं सुनाया है।
प्रशासन और राजनीति की प्रतिक्रिया
घटना के बाद: सुरक्षा एजेंसियां वीडियो फुटेज खंगाल रही हैं
नारे लगाने वालों की पहचान की कोशिश की जा रही है
राजनीतिक दलों के बयान आमने-सामने आ गए हैं सत्ता पक्ष ने इसे “राष्ट्र विरोधी मानसिकता” बताया, जबकि विपक्ष ने सवाल उठाया कि क्या हर विरोध को अपराध मान लिया जाएगा?
बड़ा सवाल
क्या JNU एक बार फिर वही पहचान ओढ़ रहा है, जिसे लेकर देश सालों से बंटा हुआ है? या फिर यह सिर्फ़ छात्रों की नाराज़गी है, जिसे सत्ता और सिस्टम सुनने से इंकार कर रहा है? JNU का नाम आते ही बहस तेज़ हो जाती है और इस बार भी वही हुआ। लेकिन सवाल यह नहीं है कि नारा किसने लगाया, सवाल यह है कि देश में असहमति की भाषा कितनी तीखी होती जा रही है।
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