FIR का आदेश देने वाले CJM विभांशु सुधीर का ट्रांसफर, वकीलों ने लगाए योगी सरकार के खिलाफ नारे
संभल (उत्तर प्रदेश):
उत्तर प्रदेश के संभल जिले में उस वक्त सियासी और न्यायिक माहौल गरमा गया जब संभल हिंसा मामले में पुलिस अधिकारियों पर FIR दर्ज करने का आदेश देने वाले मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर का अचानक तबादला कर दिया गया। उनके ट्रांसफर की खबर सामने आते ही जिला अदालत परिसर में वकीलों ने ज़ोरदार विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। वकीलों ने सरकार और पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए नारे लगाए योगी जब–जब डरता है, पुलिस को आगे करता है”।
क्या है पूरा मामला?
संभल में हाल ही में हुई हिंसा के मामले में सीजेएम विभांशु सुधीर ने बड़ा और साहसिक कदम उठाते हुए सीओ अनुज चौधरी सहित कई पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज करने का आदेश दिया था। यह आदेश पुलिस प्रशासन के लिए असहज करने वाला माना जा रहा था। इसी बीच अब उनका तबादला संभल से सुल्तानपुर कर दिया गया है। जज के इस तबादले को लेकर ही वकीलों में भारी नाराज़गी देखने को मिल रही है।
वकीलों का आरोप: ईमानदारी की सज़ा?
अदालत परिसर में प्रदर्शन कर रहे वकीलों का कहना है कि
यह तबादला प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव का नतीजा है पुलिस के खिलाफ FIR का आदेश देने की “कीमत” जज को चुकानी पड़ी यह कदम न्यायिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला है वकीलों ने साफ शब्दों में कहा कि अगर जज निष्पक्ष होकर पुलिस के खिलाफ फैसला देंगे तो उन्हें हटाया जाएगा, तो फिर न्याय कैसे बचेगा?
पुलिस को ढाल बना रही है सत्ता वकील
नारेबाज़ी के दौरान वकीलों ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में जब भी सरकार सवालों के घेरे में आती है, तो पुलिस को आगे कर दिया जाता है। और जो भी न्यायपालिका से सच सामने लाने की कोशिश करता है, उसे या तो ट्रांसफर कर दिया जाता है या दबाव में लाया जाता है। वकीलों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक जज के तबादले का नहीं है, बल्कि पूरे न्यायिक सिस्टम की आज़ादी से जुड़ा सवाल है।
उठते सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं क्या उत्तर प्रदेश में पुलिस के खिलाफ FIR का आदेश देना अब जोखिम भरा हो गया है? क्या जजों के तबादले अब उनके फैसलों से जोड़े जाने लगे हैं? क्या यह संदेश दिया जा रहा है कि पुलिस पर सवाल उठाने की इजाज़त नहीं है?
राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल
सीजेएम विभांशु सुधीर के ट्रांसफर के बाद यह मुद्दा अब सिर्फ संभल तक सीमित नहीं रहा। कानूनी और राजनीतिक हलकों में इस पर चर्चा तेज़ हो गई है और आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है। संभल में जज के तबादले और वकीलों के विरोध ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि न्यायपालिका कितनी स्वतंत्र है और सत्ता से सवाल पूछने की कितनी कीमत चुकानी पड़ती है। अब देखना होगा कि सरकार और न्यायिक प्रशासन इस विरोध पर क्या रुख अपनाते हैं।
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