खुले मंच से हथियार लहराकर बयान: खुशबु पांडेय पर भड़काऊ भाषण का आरोप

बिहार से सामने आए एक वीडियो और बयान ने एक बार फिर देश में हेट स्पीच, सांप्रदायिक उकसावे और कानून व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि बिहार की रहने वाली खुशबु पांडेय ने खुले मंच से हथियार लहराते हुए मुसलमानों के नरसंहार की अपील की और यहां तक कहा कि 15 मिनट के लिए पुलिस को हटा दिया जाए। इस कथित बयान में खुशबु पांडेय ने भागलपुर दंगे का हवाला देते हुए कहा

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भागलपुर में 15 मिनट के लिए पुलिस हटी थी और गंगा मैया की सौगंध, बहती हुई गंगा में एक भी हिन्दू की लाश नहीं थी।
यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया, जिसके बाद कई सवाल उठने लगे कि क्या यह सीधा-सीधा हिंसा भड़काने और एक समुदाय को निशाना बनाने का मामला नहीं है?

हथियार लहराने और नरसंहार की बात कानून क्या कहता है?

भारतीय कानून के तहत किसी भी सार्वजनिक मंच से: किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा की अपील नरसंहार या मारकाट का आह्वान हथियार लहराकर डर का माहौल बनाना ये सभी बातें भारतीय दंड संहिता (IPC) की गंभीर धाराओं के अंतर्गत आती हैं, जिनमें हेट स्पीच, आपराधिक धमकी और सार्वजनिक शांति भंग जैसे अपराध शामिल हो सकते हैं। कानूनी जानकारों का कहना है कि अगर वीडियो और बयान की पुष्टि होती है, तो यह मामला सिर्फ भाषण का नहीं बल्कि आपराधिक उकसावे का बन सकता है।

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भागलपुर दंगे का हवाला इतिहास को उकसावे के लिए इस्तेमाल?

भागलपुर दंगे भारतीय इतिहास के सबसे भयावह सांप्रदायिक दंगों में गिने जाते हैं, जिनमें सैकड़ों लोगों की जान गई थी। ऐसे संवेदनशील और दर्दनाक इतिहास का हवाला देकर आज हिंसा को जायज़ ठहराने की कोशिश करना, कई लोगों के अनुसार, खतरनाक मानसिकता को दर्शाता है। सोशल मीडिया पर कई यूज़र्स ने सवाल उठाया है कि क्या अब दंगों को उदाहरण बनाकर खुले मंच से हिंसा की अपील करना सामान्य होता जा रहा है?

पुलिस और प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्थानीय प्रशासन ने वीडियो का संज्ञान लिया? क्या FIR दर्ज की गई?
क्या ऐसे बयानों पर वही कार्रवाई होगी जो आम नागरिकों पर होती है? फिलहाल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन बढ़ते दबाव के बीच कार्रवाई की मांग तेज होती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस तरह के बयानों को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह: समाज में नफरत को और गहरा करेगा कानून पर से लोगों का भरोसा कम करेगा और भीड़ को हिंसा के लिए उकसा सकता है लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह नहीं कि कोई खुलेआम नरसंहार की अपील करे। खुशबु पांडेय का यह कथित बयान सिर्फ एक व्यक्ति का बयान नहीं, बल्कि यह सवाल है कि क्या भारत में हेट स्पीच पर कानून सबके लिए बराबर है? अब देखना होगा कि प्रशासन और कानून इस मामले में कितनी तेजी और निष्पक्षता से कार्रवाई करता है।

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