गज़ा की ज़मीन आज भी धुएं और मलबे से भरी हुई है।
हजारों ज़िंदगियाँ खत्म हो चुकी हैं, और लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। इसी बीच Benjamin Netanyahu का एक बयान सामने आता है जहाँ वे कहते हैं कि Iran “इज़रायली नागरिकों पर हमले कर रहा है। लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है क्या यही तर्क Gaza Strip पर लागू नहीं होता?
जहाँ स्कूल, अस्पताल और रिहायशी इलाकों को मलबे में बदल दिया गया? क्या यही लॉजिक Lebanon के मामलों में भी नहीं उठता? जहाँ आम नागरिकों को बार-बार संघर्ष की कीमत चुकानी पड़ती है?
दोहरा मापदंड या सुरक्षा का सवाल?
Israel हमेशा अपनी कार्रवाई को “आत्मरक्षा” बताता है।
वहीं, विरोधी देश उसी कार्रवाई को “हमला” और अत्याचार कहते हैं। यही अंतर है नज़रिया बदलते ही “रक्षा” और “हमला” की परिभाषा बदल जाती है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का खेल
इस पूरे संघर्ष में एक और बड़ा नाम जुड़ता है United States जिसका समर्थन इज़रायल को लगातार मिलता रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह समर्थन न होता, तो हालात और भी अलग हो सकते थे।
सवाल जो दुनिया पूछ रही है
क्या केवल एक देश की सुरक्षा ही महत्वपूर्ण है? क्या आम नागरिकों की जान की कीमत हर जगह बराबर नहीं होनी चाहिए? क्या युद्ध का कोई “नैतिक संतुलन” होता है?
इस पूरे मामले में सच क्या है, यह शायद पूरी तरह किसी के पास नहीं। लेकिन इतना तय है कि जब भी युद्ध होता है सबसे ज्यादा नुकसान आम इंसान का ही होता है।
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