क्या धुरंधर 2 सिर्फ़ एक फिल्म है या फिर एक सोच समझकर बनाया गया नैरेटिव? इस फिल्म को देखकर कई सवाल खड़े होते हैं क्या नोटबंदी जैसी नीतियों को सही ठहराने के लिए कहानियों को तोड़ा-मरोड़ा गया? क्या एक पूर्वांचल के डॉन की कहानी को जबरन जोड़कर एक नया एंगल बनाया गया? क्या ऐसी घटनाओं को भी ‘सच्चाई’ की तरह दिखाया गया, जिन पर आज भी बहस होती है?
और सबसे बड़ा सवाल

क्या चुनावी माहौल को ध्यान में रखकर एक खास समाज को टारगेट किया गया? फिल्म में दिखाए गए कुछ किरदार और घटनाएं ऐसे हैं, जो समाज के बीच अविश्वास पैदा कर सकते हैं क्या ये सिर्फ़ क्रिएटिव फ्रीडम है या फिर एक एजेंडा?
क्योंकि जब सिनेमा हकीकत और कल्पना के बीच की लाइन मिटा देता है, तो दर्शक सिर्फ़ एंटरटेन नहीं होते वो प्रभावित भी होते हैं। अब फैसला आपके हाथ में है ये फिल्म सच्चाई दिखाती है, या एक कहानी गढ़ती है?”
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